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लाहिड़ी-श्रुति प्रामाणिक क्रियायोग यद्यपि कुछ लोग बहुत बढ़ चढ़ कर उच्चता का दावा करते हैं किन्तु आज विश्व में क्रियायोग के प्रामाणिक शिक्षण एवं तत्सम्बन्धी प्रविधि के प्रसार की दृष्टि से गृहस्थ योगी लाहिड़ी महाश्य (1828-1895) के प्रपौत्र श्री शिवेन्दु लाहिड़ी के समान कोई भी सिद्ध अधिकारी नहीं है।इस अधिकार के होते हुए भी वे अत्यन्त विनम्रभाव से कहते हैं कि विवेकी व्यक्ति कोई अधिकार नहीं जताता और जो व्यक्ति अधिकार जताते हैं वे विवेकशील नहीं है। संगठन से प्रभुत्व स्थापित होता है परन्तु उसमें प्रामाणिकता का अभाव हो सकता है। लोगों को संगठित कर समूह तो बनाया जा सकता है परन्तु इसी से उस परम शुद्ध (सत्य) का स्पर्श प्राप्त नहीं हो सकता। गहन आध्यात्मिक संदर्भों में ''पंथवाद''के लिए कोई स्थान नहीं है।
परमहंस योगानन्द की प्रसिद्ध पुस्तक ''एक योगी की आत्मकथा'' (जिसका कई भाषाओं में अनुवाद हो चुका है) के माध्यम से लाहिड़ी महाशय का नाम समूचे विश्व के सत्यान्वेषियों को ज्ञात हुआ। लाहिड़ी महाशय का पूरा नाम था -श्यामाचरण लाहिड़ी। श्री शिवेन्दु लाहिड़ी को भारत की प्राचीन ऋषि-परम्परा (पिता से पुत्र पीढ़ी-दर-पीढ़ी)के अनुसार मौलिक योग पद्धति की शिक्षा ग्रहण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इस प्रकार श्री श्यामाचरण से ज्ञान एवम् अनुवांशिकी के रूप में प्रवाहित क्रियायोग पद्धति उनके पुत्र श्री तिनकौड़ी एवं पौत्र श्री सत्यचरण के माध्यम से श्री शिवेन्दु जी को वर्ष 1960 में विरासत के रूप में प्राप्त हुई जब इनके स्वर्गीय पिता श्री सत्यचरण लाहिड़ी ने ''सत्यलोक'' (डी-22/3, चौषट्टि घाट, वाराणसी-221001) स्थित पारिवारिक मंदिर में इन्हें क्रिया-योग की विधिवत् दीक्षा दी। क्रियायोग क्रिया का मूल अर्थ है ''सतत जागरूकता जनित गतिशीलता''और योग का अर्थ है ''समन्वय''। इस प्रकार क्रियायोग मन के कुचक्र द्वारा निर्मित आयाम के बाहर सतत जागरूकता जनित गतिशीलता तथा विभेदकारी चित्तवृत्ति से उत्पन्न कर्मकाण्ड के समन्वय पर बल देता है। |
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